बुधवार, 28 फ़रवरी 2018

जोगी रा स र र र र र र र र र र ........



.... छोटी होली के दिन से ही  एकदम काला, हरा और बैगनी रंग का इंतजाम होने लगता था ! और  पक्का रंग के चक्कर में बैटरी की कालिख भी  घोल कर रखते थे ! उस जमाने में  गुलाल का प्रयोग रंगने में नहीं किया जाता था .. गुलाल का प्रयोग  केवल होली की शाम होली मिलने के समय ही किया जाता था !


शाम को जब खेल के थक के घर आते थे .... तो अम्मा सबसे पहले "बकुआ" (सरसों और हल्दी की सिल बट्टे पर पीसकर ) रगड़ रगड़ के लगाती थी फिर जो मैल शरीर से निकलता था  उसे पुडिया बनाकर देती और कहती की जाओ इसे होलिका में दाल आओ ... हम फिर निकल जाया करते होलिका के हुडदंग में वो पुडिया डालने और ... फिर वही जोगी रा स र र र र र र र र..... 

बड़ी मुश्किल से रात गुजारी जाती थी ... और अगले दिन सुबह सुबह ही  सबसे पहले  अम्मा हमें पुराने कपडे देती और कडवा तेल देती और हम उसे पुरे शरीर पर लगाते जिससे कि रंग न चढ़े ... और वो होली वाली टोपी लगाकर दोस्तों की टोली के साथ निकल पड़ते जोगी रा स र र र र र र .....

क्या मस्ती थी ... उन दिनों की क्या मज़ा था उन दिनों का .... अब कहा होली ... अब तो बस हो...... ली.... न वो गुझिया रही .. न ही बड़े रहे ... न समोसे .. न रसगुल्ले .... अब तो रंग ही नहीं रहे होली में ....

अब कहाँ जोगी रा स र र र र र र र र.....  कहने वाले रहे .... 

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

गर्मी बहुत है

सुनो, 
गर्मी बहुत है 
अपने अहसासों की हवा 
को जरा और बहने दो 
यादों के पसीनों को 
और सूखने दो 
सुनो, 
गर्मी बहुत है 
गुलमोहर के फूलों 
से सड़कें पटी पड़ी हैं 
ये लाल रंग 
फूल का 
सूरज का 
अच्छा लगता है 
अपने प्यार की बरसात को 
बरसने दो 
बहुत प्यासी है धरती 
बहुत प्यासा है मन 
भीग जाने दो 
डूब जाने दो 
सुनो,
गर्मी बहुत है .... 

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

सपने ..

कुछ सपने केवल सपने ही रह जाते हैं 
बिना पूरे हुये, बिना हकीकत हुये 
और हमे वो ही अच्छे लगते हैं 
अधूरे सपने, बिना अपने हुये 
हम जी लेते हैं 
उसी अधूरेपन को
उसी खालीपन को
सपने की चाहत में
जानते हुये भी ....
सपने तो सपने हैं
सपने कहाँ अपने हैं
यथार्थ को छोड़कर
परिस्थिति से मुह मोड़कर
हम जीते हैं सपने में
सपने हम रोज देखते हैं
कुछ ही सपनो को हम जीते हैं
बाकी सपने सपने ही रह जाते हैं
सपने तो सपने हैं ...
वो कहाँ अपने हैं ....

शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

पगडण्डी

रात की चादर ओढ़े
चुपचाप सोयी है
वो पगडण्डी जो शहर से
गाँव की ओर आती है
पगडण्डी पर उगी घासें
नाम हैं, भीगी हैं
जैसे सुबक कर
कोई चुप हो गया हो
बहुत रोई होगी उस
राहगीर के लिए जो लौट के न आया
उसका घर छुटा
वो भीतर से टुटा
सन्नाटा है पसरा
पगडण्डी अभी भी
चुप है सुबक रही है ...... इंतज़ार में ..

सोमवार, 13 जून 2016

आत्म विशवास

यूँ ही सिकोड़ कर 
आलमारी के एक कोने में कहीं ... 
पुराने अखबार सी हो गयी है जिंदगी 
तिरस्कारित कल की खबर 
जिसको कोई पढता ही नहीं 
चिमुड़  गया है हर पेज 
चाहो तो भी खोल न पाओ .... 
उन्ही सीले हुए पेजों पर 
कही कही चमकते इश्तहार भी हैं 
जिसका वजूद धरातल पर 
कहीं नहीं हैं .... 
सोच रहा हूँ क्या फायदा है 
बेच दूँ .. इस रद्दी को 
किसी कबाड़  वाले को 
जिसका कोई भाव न हो 
क्या फायदा रखने से भी 
जला डालूं , कुछ तपिश ही 
महसूस कर लूँ ..... 
मगर आज भी हर पेज 
पर दीखता है वही उम्मीद 
जो हर सुबह की ताज़ी खबर 
नए अखबार में होती है ..... 

सोमवार, 9 नवंबर 2015

कितने बार

जाने कितने बार मुझे तुमने इस धरती पर जन्म दिया 
जाने कितने बार मुझे तुमने ये स्वरुप  दिया 
जाने कितने बार मुझे इस नाव पर चढ़ा दिया 
जाने  कितने बार मुझे इस भवसागर से पार किया 
जाने कितने बार मुझे इस मृत्यु ने आलंगन किया 
जाने  कितने बार मैंने इस मृत्यु का वरन किया 
अब थक गया हूँ मैं प्रभु इस भवसागर की धार में 
अब बस करो हे  प्रभु इस भवसागर की जंजाल से .... 

यादें

कुछ भूली -बिसरी यादें हैं 
कुछ ताज़ी तरीन बातें हैं 
कुछ यादें मीठी मीठी हैं 
कुछ करेले सी कडवी हैं 
कुछ को भूलना चाहा  में 
कुछ यादों को में भूल गया 
कुछ को भुला कर भुला दिया 
कुछ यादों को मिटा दिया 
कुछ यादें पल दो पल की थीं 
कुछ यादें चिपक कर बैठी हैं 
में हरपल यादों में रहता हूँ 
यादों को ही में जीता हूँ 
कुछ यादें अपनी अपनों की हैं 
कुछ यादें औरों की जैसी हैं 
यादें तो यादें है ... यादों का क्या......